आपको भी आत्मरक्षा के लिये चाहिये हथियार का लाइसेंस, जानिए लाइसेंस बनवाने की पूरी प्रक्रिया और नियम

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Arms license

Arms License Complete Process and Rules : आपने कई बार देखा होगा लोग आत्मरक्षा के लिये हथियार रखते है, आपको बता दे कि दबंग लोग या अमीर लोग स्टेट्स सिंबल के तौर पे हथियार रख रहे है। तो कुछ लोगो के लिये वाकई में आत्मरक्षा के लिये हथियार कि जरुरत होती है।

हाल हि में बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा को आर्म्स लाइसेंस जारी किया गया है। अब वह अपनी आत्मरक्षा के लिए हथियार रख सकती है। ये वही नूपुर शर्मा हैं, जो पहले बीजेपी की प्रवक्ता थीं। एक विवादित टिप्पणी के चलते पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

उसके खिलाफ कई राज्यों में मामले दर्ज हैं। ऐसे में कई लोग जानना चाहते हैं कि शस्त्र लाइसेंस कैसे लिया जा सकता है? हथियार हासिल करने की कानूनी प्रक्रिया क्या है? तो हम आपको इससे जुड़ी अहम जानकारी विस्तार से बताने जा रहे हैं।

लाइसेंस कौन जारी करता है

शस्त्र अधिनियम, 1959 में संशोधन शस्त्र (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार राज्य सरकारों के गृह विभाग को किसी भी शस्त्र का लाइसेंस जारी करने का अधिकार है। अलग-अलग राज्यों में डीएम यानी जिलाधिकारी, जिला कलेक्टर, कमिश्नर या इस रैंक के अन्य अधिकारी लाइसेंस जारी करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में पुलिस थाना और स्थानीय खुफिया इकाई (एलआईयू) अहम भूमिका निभाते हैं।

शस्त्र अधिनियम, 1959

शस्त्र अधिनियम, 1959 भारत में हथियारों और गोला-बारूद आदि के उपयोग को नियंत्रित करने के उद्देश्य से भारत की संसद द्वारा पारित किया गया था। ताकि उनसे अवैध हथियार और हिंसा को रोका जा सके। इसी आर्म्स एक्ट की धारा 13(2) के तहत नए शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन करने का प्रावधान है. आर्म्स एक्ट, 1959 में भी साल 2016 और 2019 में अहम संशोधन किए गए हैं।

आवेदन पत्र का प्रारूप

देश के हर राज्य में हथियारों के लिए लाइसेंस जारी करने की अपनी प्रक्रिया है। जैसे यूपी में बंदूक का लाइसेंस बनवाने के लिए पहले एक तय प्रारूप (आर्म्स रूल 2016 फॉर्मेट डी-4) में आवेदन करना होता है। यह आवेदन आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 13(2) के तहत दाखिल किया गया है। इसमें तीन तरह के प्रारूप हैं। देश के कई राज्यों में यह प्रक्रिया ऑनलाइन भी है।

ऐसे करती है पुलिस और एलआईयू की जांच

इस प्रारूप की एक प्रति, जिसे अनुसूची 3 कहा जाता है, जांच के लिए पुलिस यानी एसएसपी या पुलिस आयुक्त के कार्यालय में जाती है। जहां से एक कॉपी संबंधित थाने में जाती है और एक कॉपी एलआईयू को जाती है। पुलिस यह जांच करती है कि आवेदक उक्त स्थान का निवासी है या नहीं।

उन पर कोई केस दर्ज है या नहीं? यदि पंजीकृत है तो किस प्रकार का मामला है ? प्रपत्र का एक भाग जिला अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (DCRB) को यह सत्यापित करने के लिए भेजा जाता है कि आवेदक का कोई आपराधिक पूर्ववृत्त है या नहीं।

एलआईयू ऐसे जांचता है आवेदक की बुद्धिमता। वह पता लगाती है कि क्या वह किसी देश-विरोधी या जन-विरोधी गतिविधियों में शामिल है। या फिर वह ऐसा कोई काम नहीं करता, जिससे लोगों में डर का माहौल पैदा हो. थाने से जांच रिपोर्ट सीओ या एसीपी के पास जाती है।

इस रिपोर्ट के साथ एसएचओ का शपथ पत्र भी संलग्न है। वहां से सीओ या एसीपी उसे एसपी सिटी या एडीसीपी के पास भेज देते हैं। फिर जांच रिपोर्ट और जानकारी पूरी करने के बाद इसे एसएसपी या पुलिस आयुक्त के कार्यालय में भेजा जाता है। वे अपनी सिफारिश या टिप्पणी के बाद पूरी रिपोर्ट डीएम या कमिश्नर को भेजते हैं।

ऐसे होती है मजिस्ट्रियल इंक्वायरी

इसी तरह, आवेदन पत्र की एक प्रति पुलिस के साथ-साथ सिटी मजिस्ट्रेट या उप-जिला मजिस्ट्रेट (एसडीएम) के कार्यालय को भी भेजी जाती है। जहां से आवेदक से संबंधित तहसील को भेजा जाता है। तहसीलदार इसे क्षेत्र के लेखपाल को भेजता है। लेखपाल मौके पर ही जानकारी जुटाता है कि आवेदक ने किसी जमीन पर अतिक्रमण तो नहीं किया है।

या कहीं उनका जमीन से जुड़ा कोई विवाद तो नहीं है? फिर क्षेत्र का अमीन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करता है कि आवेदक के पास किसी प्रकार का सरकारी ऋण या बकाया है या नहीं। क्या वह राजस्व संबंधी किसी भी मामले में डिफाल्टर नहीं है?

इसके बाद ये लोग अपनी रिपोर्ट नायब तहसीलदार को भेजते हैं। इसके साथ शपथ पत्र भी संलग्न है। फिर तहसीलदार और सिटी मजिस्ट्रेट या एसडीएम उस रिपोर्ट को डीएम या कमिश्नर को उनकी सिफारिश या टिप्पणी के बाद भेजते हैं।

आवेदन के समय हथियार की जानकारी देनी होगी

लाइसेंस के लिए आवेदन करते समय आपको यह बताना होगा कि आपको किस तरह के हथियार रखने और चलाने के लिए लाइसेंस लेना है। उदाहरण के लिए, पिस्टल जैसा छोटा हथियार, रिवाल्वर या राइफल जैसी बड़ी बंदूक, सिंगल-बैरल या डबल-बैरेल। जो हथियार प्रतिबंधित हैं, उनका लाइसेंस जारी नहीं किया जा सकता। इन प्रतिबंधित हथियारों में 38 बोर, 9 एमएम और 303 जैसे हथियार शामिल हैं.

यहां लाइसेंस के लिए आवेदन करें

सबसे पहले आपको लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आवेदन करना होगा, जिसका एक निश्चित प्रारूप है, जिसे शस्त्र नियम 2016 प्रारूप डी के रूप में जाना जाता है, सबसे पहले इस आवेदन को पूरी तरह से भरें और डीएम, जिलाधिकारी या असलहा यानी शस्त्र लाइसेंस को भेजें आयुक्त कार्यालय में मौजूद विभाग में जमा है।

वन संरक्षक भी जांच करते हैं

इसी प्रकार जो आवेदक ग्रामीण या वन क्षेत्रों में रहते हैं, उनके आवेदन का एक प्रारूप वन संरक्षक को भेजा जाता है। जिसमें वह आवेदन के बारे में बताता है कि वह उसी क्षेत्र का रहने वाला है।

वन क्षेत्र में उससे किसी को कोई भय या खतरा नहीं है। वह वन क्षेत्र में ऐसा कोई काम नहीं करता है जिससे वन क्षेत्र को नुकसान हो। वन संरक्षक लगातार अपनी रिपोर्ट डीएम या आयुक्त कार्यालय को भेजता है।

आवश्यक शूटिंग रेंज प्रमाण पत्र

ऐसे नियमों और प्रारूप बी के तहत, एक प्रति शूटिंग रेंज में जाती है। जहां आवेदक को बुलाकर उसका ट्रायल लिया जाता है। वहां उसे हथियार से फायर करवाया जाता है। इसे चलाने की शॉर्ट ट्रेनिंग भी दी जाती है।

यदि आवेदक सफल होता है, तो उसे एक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। जिसे आवेदक के आवेदन पत्र की एक प्रति के साथ संलग्न कर रिपोर्ट के साथ डीएम या आयुक्त कार्यालय को वापस भेज दिया जाता है।

आवेदक का वचन बंध

शस्त्र लाइसेंस के आवेदन के साथ एक प्रॉमिस बांड (Promise Bond) भी संलग्न होता है। जिसमें उन्होंने वादा किया है कि वह अपने हथियार और अपनी गोलियों को सुरक्षित तरीके से रखेंगे। वह हथियार को दुरुपयोग या चोरी से बचाने के लिए सुरक्षित स्थान, तिजोरी या अलमारी में रखेगा।

वह उसे सकुशल अपने साथ ले जाएगा। उस हथियार से होने वाले खतरों को देखते हुए वह अपने घर के सदस्यों और खासकर बच्चों को भी इससे अवगत कराएंगे। और आवेदक वचन देता है कि वह शस्त्र अधिनियम, 1959 के नियमों का पालन करेगा।

आवेदक की चिकित्सा परीक्षा

आर्म्स एक्ट, 1959 के नियम 11 के उपनियम 4 के क्लॉज (जी) में हथियारों के लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति की मेडिकल जांच का प्रावधान है। जिसके तहत संबंधित सरकारी अस्पताल में उसकी शारीरिक व मानसिक जांच की जाती है।

दरअसल, इस परीक्षण के तहत विशेषज्ञ (डॉक्टर) आवेदक की तीव्रता और शारीरिक फिटनेस का आकलन करते हैं। उसके आधार पर वे रिपोर्ट बनाकर डीएम या कमिश्नर ऑफिस को भेजते हैं।

डीएम या कमिश्नर को यह विशेष अधिकार होता है

जब डीएम या डीसी ऑफिस के असलहा या आर्म्स लाइसेंस विभाग को हर जगह से रिपोर्ट मिलती है. फिर सभी रिपोर्ट आवेदन पत्र के साथ संलग्न हैं। जब फ़ाइल पूरी तरह से तैयार हो जाती है, तो उसे क्रम में रखा जाता है। जिलाधिकारी या आयुक्त उनकी इच्छा और समय के अनुसार उसी क्रम में अवलोकन के लिए फाइल मंगवाते हैं।

वे आवेदक और उसकी फाइल को भली-भांति देखते हैं, उसका अवलोकन करते हैं। फिर वे तय करते हैं कि लाइसेंस जारी करना है या नहीं। गौरतलब है कि लाइसेंस देना या न देना पूरी तरह से डीएम, जिलाधिकारी या आयुक्त पर निर्भर करता है। वे चाहें तो आवेदन रद्द भी कर सकते हैं।

ये दस्तावेज आवेदन के साथ संलग्न जरुरी हैं

अगर आप शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन करने जा रहे हैं तो आपके लिए यह जानना भी जरूरी है कि आवेदन के प्रारूप के साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाने जरूरी हैं।

डीएम या आयुक्त कार्यालय के शस्त्र लाइसेंस विभाग में आवेदन जमा करते समय आधार, या पहचान प्रमाण, पता प्रमाण, चिकित्सा प्रमाण पत्र, आयु प्रमाण (आपकी आयु 21 वर्ष या उससे अधिक है), चरित्र प्रमाण पत्र और तीन साल का आईटीआर जमा करना आवश्यक है आदि।

पंजीकृत दुकानों से ही हथियार खरीद सकते हैं।

डीएम या आयुक्त कार्यालय से लाइसेंस जारी होने के बाद आवेदक वही हथियार खरीद सकता है जिसके लिए उसने आवेदन किया था. वह सरकारी पंजीकृत दुकान से ही हथियार खरीद सकता है। वह जो हथियार खरीदता है और उसे लाइसेंस पर चढ़ाता है। आवेदक को अपनी जानकारी संबंधित थाने को भी देनी होगी।

ट्रैक रखना होगा

अगर हथियार पिस्टल, रिवाल्वर या बंदूक है तो उसके साथ कितनी गोलियां खरीदी गईं। इसका सालाना हिसाब भी देना होता है। उदाहरण के लिए, आपने एक वर्ष में कितनी गोलियां खरीदीं? आपने कहां खर्च किया यह जानकारी देने के बाद ही आप दोबारा नई गोलियां खरीद सकते हैं।

इस वजह से लाइसेंस रद्द हो सकता है, जेल भी हो सकती है

अगर कोई लाइसेंस धारक कठोर फायर करता है। अगर कोई दिखावे के लिए या प्रभावित करने के लिए गोली चलाता है या दहशत पैदा करने के लिए गोली चलाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

या उसे जेल भी जाना पड़ सकता है। यदि अनुज्ञप्तिधारी शस्त्र अधिनियम, 1959 के नियम व शर्तों का पालन नहीं करता है तो जिलाधिकारी या आयुक्त उसका अनुज्ञप्ति निरस्त कर शस्त्रों को जब्त कर मलखाना में रख सकते हैं।

ऐसे होता है लाइसेंस रिन्यूअल

बंदूक का लाइसेंस पहले तीन साल के लिए मिलता था, जिसकी अवधि अब सरकार ने बढ़ाकर पांच साल कर दी है। इस अवधि के बाद यानी वैधता खत्म होने के बाद लाइसेंस को फिर से रिन्यू कराना होता है। इसके लिए भी लाइसेंस धारक को दोबारा जांच के बाद लाइसेंस शुल्क जमा करना होगा। निशानेबाजी के लिए खिलाड़ी शस्त्र लाइसेंस भी लेते हैं।

लाइसेंस के लिए 11 श्रेणियां हैं

शस्त्र अधिनियम, 1959 के अनुसार शस्त्र लाइसेंस के लिए 11 श्रेणियों का उल्लेख किया गया है। जिसमें आम जनता के साथ-साथ सेना या पुलिसकर्मियों, पूर्व सैनिकों, खिलाड़ियों, लाइसेंसधारी के आश्रितों और उनके उत्तराधिकारियों को लाइसेंसधारी की मृत्यु के बाद लाइसेंस देने का प्रावधान है।

ऐसे में लाइसेंसी हथियारों को दूसरे राज्य में ले जाया जा सकता है

वैसे तो शस्त्र लाइसेंस आवेदक के राज्य की सीमा तक ही होता है। यदि कोई आवेदक अपने लाइसेंसी हथियार के साथ दूसरे राज्य में जाना चाहता है तो शस्त्र नियम 1962 के उपनियम 53 के अनुसार आप पूरे देश के लिए अपना लाइसेंस बनवा सकता है।

आपके राज्य द्वारा जारी लाइसेंस को एक प्रक्रिया के तहत अखिल भारतीय परमिट में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद आप अपने हथियार के साथ पूरे देश में कहीं भी घूम सकते हैं।

लेकिन सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों को निर्देशित किया जाता है कि जब भी किसी का लाइसेंस पूरे देश के लिए लागू हो तो उससे पहले उन्हें गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी। इसकी जटिल प्रक्रिया के कारण देश में बहुत कम लोगों के पास गन लाइसेंस का ऑल इंडिया परमिट होता है।